असत्य पर सत्य के विजय का पर्व विजय दशमी आज

असत्य पर सत्य की जीत का पर्व दशहरा (विजय दशमी) शुक्रवार को मनाया जाएगा। गुरुवार को पूर्व संध्या पर पर्व मनाने की तैयारी पूरी कर ली गई। रामलीला समितियों की ओर से जहां विजय दशमी मेले (श्रीराम-रावण युद्ध) के प्रदर्शन के लिए मैदान आदि की साफ-सफाई का कार्य पूरा किया गया तो रावण के पुतले भी तैयार किए जाते रहे।

दशहरे का उत्सव शक्ति और शक्ति का समन्वय बताने वाला उत्सव है। नवरात्रि के नौ दिन जगदम्बा की उपासना करके शक्तिशाली बना हुआ मनुष्य विजय प्राप्ति के लिए तत्पर रहता है। इस दृष्टि से दशहरे अर्थात विजय के लिए प्रस्थान का उत्सव का उत्सव आवश्यक भी है। भारतीय संस्कृति सदा से ही वीरता व शौर्य की समर्थक रही है। प्रत्येक व्यक्ति और समाज के रुधिर में वीरता का प्रादुर्भाव हो कारण से ही दशहरे का उत्सव मनाया जाता है।

यदि कभी युद्ध अनिवार्य ही हो तब शत्रु के आक्रमण की प्रतीक्षा ना कर उस पर हमला कर उसका पराभव करना ही कुशल राजनीति है। भगवान राम के समय से यह दिन विजय प्रस्थान का प्रतीक निश्चित है। इस पर्व को भगवती के ‘विजया’ नाम पर भी ‘विजयादशमी’ कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि आश्विन शुक्ल दशमी को तारा उदय होने के समय ‘विजय’ नामक मुहूर्त होता है। यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है। इसलिए भी इसे विजयादशमी कहते हैं। ऐसा माना गया है कि शत्रु पर विजय पाने के लिए इसी समय प्रस्थान करना चाहिए।

इस दिन श्रवण नक्षत्र का योग और भी अधिक शुभ माना गया है। युद्ध करने का प्रसंग न होने पर भी इस काल में राजाओं (महत्त्वपूर्ण पदों पर पदासीन लोग) को सीमा का उल्लंघन करना चाहिए। दुर्योधन ने पांडवों को जुए में पराजित करके बारह वर्ष के वनवास के साथ तेरहवें वर्ष में अज्ञातवास की शर्त दी थी। तेरहवें वर्ष यदि उनका पता लग जाता तो उन्हें पुनः बारह वर्ष का वनवास भोगना पड़ता।

इसी अज्ञातवास में अर्जुन ने अपना धनुष एक शमी वृक्ष पर रखा था तथा स्वयं वृहन्नला वेश में राजा विराट के यहँ नौकरी कर ली थी। जब गोरक्षा के लिए विराट के पुत्र धृष्टद्युम्न ने अर्जुन को अपने साथ लिया, तब अर्जुन ने शमी वृक्ष पर से अपने हथियार उठाकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी। विजयादशमी के दिन भगवान रामचंद्रजी के लंका पर चढ़ाई करने के लिए प्रस्थान करते समय शमी वृक्ष ने भगवान की विजय का उद्घोष किया था। विजयकाल में शमी पूजन इसीलिए होता है।

श्रीराम-रावण युद्ध के लिए मैदान तैयार, हुई सफाई

19 अक्टूबर को पूरे विश्व में दशहरा मनाया जाएगा. इस दिन हर गली-नुक्कड़ और बड़े-बड़े मैदानों में रावण का पुतला जलाया जाएगा. बुराई पर अच्छाई की जीत का ये जश्न धूमधाम से मनाया जाएगा. मैदानों में मेले लगेंगे और मेले में राम और रावण से जुड़े खेल-खिलौने दिखेंगे. एक तरफ परिवार मिलकर चाट खाते हुए रावण वध देखेगा, वहीं, दूसरी ओर कई जगहों पर रावण के इस मृत्यु दिन पर शोक मनाया जाएगा. जी हां, भारत में ऐसे ये 6 मंदिर हैं जहां राम नहीं रावण की पूजा की जाती है. इसके अलावा घर के बड़े बच्चों को विजयदशमी का महत्व समझाते हुए नज़र आएगें तो कुछ आपस में Happy Dussehra के मैसेसेज शेयर करेंगे. देश में अधिकतर स्थानों पर होने वाली रामलीला शारदीय नवरात्र की नवमी के दिन ही समाप्त हो जाती है। दशमी के मौके पर मेले का आयोजन किया जाता है। ऐसे में पूरा देश सहित अन्य स्थानों पर विजय दशमी मेले के अवसर पर असत्य पर सत्य की जीत स्वरूप श्रीराम-रावण के युद्ध के प्रदर्शन के लिए मेला स्थल की साफ-सफाई का कार्य पूरा कराया गया तो अस्थाई दुकानें लगनी भी शुरू हो गई। उधर रामलीला समितियों सहित अन्य कलाकारों द्वारा रावण के पुतले को तैयार किए जाने का कार्य भी पूरे दिन चलता रहा।